{"product_id":"sah-saa-signed-geetanjali-shree","title":"सह-सा \/ Sah-Saa (Signed by Geetanjali Shree)","description":"\u003cdiv style=\"background:#fdf2f8;border:2px solid #ec4899;border-radius:8px;padding:14px;margin-bottom:18px;text-align:center;\"\u003e\n\u003cstrong style=\"color:#be185d;font-size:15px;\"\u003e✒️ SIGNED COPY\u003c\/strong\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan style=\"color:#831843;font-size:13px;\"\u003eगीतांजलि श्री द्वारा हस्ताक्षरित · Signed by Geetanjali Shree · Only one copy · Excluded from sale pricing\u003c\/span\u003e\n\u003c\/div\u003e\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eइंटरनेशनल बुकर पुरस्कार पाने वाली प्रथम भारतीय कथाकार की एक और अविस्मरणीय कृति।\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e‘सह-सा’ छोटे-छोटे अकस्मातों में बनती व्यापक मानव नियति की कहानी है। रोज़मर्रा के अनाटकीय प्रसंगों की टकराहटों से बड़े सवालों के खुले में आ जाने की कहानी।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eन्यायमूर्ति भूलेराम मिसिर अवकाश-प्राप्ति के बाद पत्नी प्रेमिला, बेटी चिया, और अपाहिज अम्मा के साथ रह रहे हैं। पत्नी व बेटी नौकरी पर निकल जाती हैं और घर की ज़िम्मेदारियाँ खुशी खुशी उन्होंने अपने ऊपर ले ली हैं। माँ अपनी शोर करती पटरागाड़ी पर बैठ घर भर का मुआयना करती रहती हैं। सब साथ भी हैं, अलग-थलग भी।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eसहसा एक दिन वे बेआराम हो जाते हैं। प्यार से बनाये उनके वन-प्रांगण में एक गौरैया उनकी बाँह पर आ बैठती है। वे मुस्कुराते हैं कि बाँह को डाल समझ रही है पर तभी मन में संदेह कौंधता है कि उन्हें देख ही नहीं रही शायद। ‘मैं क्या अदृश्य? हवा? प्रेत? भूत सा फिरता अपने घर में।’ यह संदेह यादों की लंबी कड़ी से जुड़ता है। जीते जी अदृश्य होने लगे भूले मृत्योपरांत चारों ओर छा जाते हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eप्रकट कथा के पीछे, उसके अनकहे में, एक और कथा भी चलती है जो दिखाती है कि इस वाचाल समय में हम वही देखते सुनते हैं जो ढिंढोरा है, भड़कीला है, उसके पीछे हो रहे को नहीं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eइस कृति में भी गीतांजलि श्री की भाषा और शैली का अपना वैभव है। बदलती स्थितियों, मनःस्थितियों को उजागर करती कभी चुटीली, नुकीली, कभी प्रशांत, उदास और दार्शनिक। हमेशा बहुअर्थी। और इसमें है उस प्रकृति का अद्भुत वात्सल्य जिसे हम बेगाना बना बैठे हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cstrong\u003e‘सह-सा’ एक अनूठी प्रेम गाथा है।\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e\u003ch4\u003eलेखिका के बारे में\u003c\/h4\u003e\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eगीतांजलि श्री\u003c\/strong\u003e के पाँच उपन्यास, पाँच कहानी संग्रह और एक शोध ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार (रेत समाधि \/ \u003cem\u003eTomb of Sand\u003c\/em\u003e), वॉरिक प्राइज़ फॉर ट्रांसलेटेड विमेन, इंग्लिश पेन ट्रांसलेट्स अवार्ड, लूना विरीनो इंटरनेशनल अवार्ड और हार्पर बाज़ार्स ऑथर ऑफ़ द ईयर अवार्ड से नवाज़ा गया है। उन्हें फ्रांस के एमिल गीमे प्राइज़ के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया। इसके अलावा उन्हें हिंदी एकेडमी पुरस्कार, द्विजदेव सम्मान, कृष्ण बलदेव वैद पुरस्कार, कथा यूके सम्मान, राम आडवाणी पुरस्कार, वनमाली राष्ट्रीय कथा सम्मान, कलिंग अंतरराष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार आदि भी मिले हैं।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eउनके उपन्यास हैं \u003cem\u003eमाई\u003c\/em\u003e, \u003cem\u003eहमारा शहर उस बरस\u003c\/em\u003e, \u003cem\u003eतिरोहित\u003c\/em\u003e, \u003cem\u003eखाली जगह\u003c\/em\u003e और \u003cem\u003eरेत समाधि\u003c\/em\u003e; कहानी संग्रह हैं \u003cem\u003eअनुगूँज\u003c\/em\u003e, \u003cem\u003eवैराग्य\u003c\/em\u003e, \u003cem\u003eमार्च माँ और साकुरा\u003c\/em\u003e, \u003cem\u003eयहाँ हाथी रहते थे\u003c\/em\u003e तथा \u003cem\u003eप्रतिनिधि कहानियाँ\u003c\/em\u003e।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cem\u003eआवरण: मैथिली दोशी अफ़ाले · कैलिग्राफ़ी: निखिल अफ़ाले\u003c\/em\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":52369139499224,"sku":"9789360860424","price":499.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0818\/1471\/6632\/files\/Sah-Saa_7057.webp?v=1788516496","url":"https:\/\/www.readersparadise.co\/products\/sah-saa-signed-geetanjali-shree","provider":"Readers Paradise","version":"1.0","type":"link"}